“संसार जिनके पीछे दौड़ता है ! वे मेरे प्रभू कंचनमृग के पीछे दौड़े !”

संसार जिनके पीछे दौड़ता है ! वे मेरे प्रभू कंचनमृग के पीछे दौड़े !

Jai Shree Ram



संसार जिनके पीछे दौड़ता है ! वे मेरे प्रभू कंचनमृग के पीछे दौड़े ! यह एक कथन है जिसे लंका मे सीता ने कही थी ! यानी रामायाण की है ! सीता ने यह बात उस समय कही थी जब रावण सीता को बध करने मे असफल होकर फिर एक महीने का समय देकर चला जाता है ! रावण और मन्दोदरी के चले जाने के बाद सीता रोने लगती है ! उसकी सेविका त्रिजटा से कहती है त्रिजटा वास्तव मे तुम मेरी सेवा करना चाहती हो तो कुछ लकड़ियॉ लाकर मेरे लिए एक चिता बना दो और उसमे आग लगा दो !

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राम के विरह की ज्वाला से चिता की ज्वाला शीतल होगी ! त्रिजटा उसे धीरज बँधाती हुई कहती है कि प्रभु रामचंद्र उसे जल्दी ही उद्धार अवशय करेंगे ! त्रिजटा सीता को विश्राम करने को कहकर स्वयं भी शीता की आज्ञा से सोने के लिए चली जाती है ! जब सीता अकेली रह गई तो वह अपने ह्रदय की आवेग को इस प्रकार प्रकट करती है ! इस समय उसके कारण प्रभु रामचंद्र कि कैसी दशा हुई सोचने लगती है ! वह मन ही मन राम से क्षमा मॉगती है !

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सीता अपने को भयानक अपराधी समझती है ! क्योकि वह हठ करके कंचन मृग का चर्म क्यो मॉगा थ? मेरे हठ के कारण लक्ष्मण को रक्षा का भार सौपकर तीव्र गति से कंचन मृग के पीछे दौड़े ! सीता सोचती है संसार के लोग जिस प्रभु रामचंद्र को पाने के लिए पीछे-पीछे दौड़ते है, उसी प्रभु रामचंद्र कंचन मृग के पीछे दौड़ने लगे मेरे ही कारण ! ओह प्रभु ! तुम कैसे हो और मै कैसी हुँ ! इस प्रकार की बाते सोचकर सीता अपने को कोसती है !  

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